पुष्प-विज्ञान : किस देवी-देवता पर कौन सा पुष्प
चढ़ाएँ
देवी-देवता आकाश लोक में रहते हैं और वायुतत्व प्रधान होते हैं। उनकी भाषा प्रकाश-भाषा है। वायुतत्त्व प्रधान
होने के कारण वे गंधप्रिय होते हैं। गंध-तरंगें पृथ्वी लोक से संबंधित हैं। देवी-देवता जब भूलोक पर विचरण करते हैं तो सुगंधमय स्थलों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। कर्मकांड में इसीलिए सुगंधित पदार्थों का प्रावधान किया गया है। प्रत्येक देवी-देवता की गंध-पसंद अलग-अलग होती है, जिसके कारण वे अपनी पसंद की गंध की ओर शीघ्र ही आकृष्ट हो जाते हैं। देवी-देवताओं की गंध-पसंद को ध्यान में रखकर ही देवी-देवता की पूजा करते समय उनकी पसंद के गंधवाले पुष्प, इत्र आदि पूजा में प्रयोग किए जाते हैं। यही नहीं, किस देव-शक्ति को कितनी पुष्प-पत्तियाँ अर्पित करनी हैं, यह गणित भी हमारे ऋषि-मुनियों ने निर्धारित कर रखा है। पूजा-पाठ करनेवाले का श्रद्धा भाव भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि श्रद्धा से अर्पित पदार्थ उस गंध पदार्थ की गुणवत्ता को और बढ़ा देते हैं, जब हम देवी-देवता पर पुष्प-पत्तियाँ या इत्र आदि अर्पण करते हैं तो उन पुष्प-पत्तियों की तरंगें देवशक्ति को आकृष्ट करती हैं, जिसका लाभ पूजा करनेवाले को पहुँचता है।
किस देवता को किस सुगंध का इत्र अर्पण करना चाहिए
पुण्य का नाम : मोगरा (बेला)
किस देवी-देवता को अर्पित : दुर्गा देवी
अधिकाधिक तरंगे आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : १ अथवा ९
पुष्य का नाम: रजनीगंधा
किस देवी-देवता को अर्पित : शिव
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : ९ अथवा १०
पुष्य का नाम : कनेर
किस देवी-देवता को अर्पित : महाकाली
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्पों की न्यूनतम संख्या : १
पुष्य का नाम : तगर
किस देवी-देवता को अर्पित : अला
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्पों की न्यूनतम संख्या :
पुष्प का नाम : स्वस्तिका
किस देवी-देवता को अर्पित : सरस्वती (स्खेत)
अधिकाधिक तरंगे आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : ९ (आदिशक्ति के हर रूप को
९ अंक से पूजा जाता है।
पुष्प का नाम : गुलदाऊदी या गेंदा या कमल
किस देवी-देवता को अर्पित : महालक्ष्मी व लक्ष्मी
अधिकाधिक तरंगे आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : १ वही
पुष्प का नाम: कोई भी रक्तपुष्प
किस देवी-देवता को अर्पित : गणेश
अधिकाधिक तरंगे आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : १, ३, ५,७
पुष्प का नाम : तुलसी
किस देवी-देवता को अर्पित : विष्णु
अधिकाधिक तरंगे आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : वही
पुष्प का नाम : जाई (चमेली का एक दूसरा प्रकार)
किस देवी-देवता को अर्पित : श्रीराम
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्यों की न्यूनतम संख्या : ४
पुष्प का नाम: चमेली
किस देवी-देवता को अर्पित : हनुमान्
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्पों की न्यूनतम संख्या : ५
पुष्प का नाम : जूही
किस देवी-देवता को अर्पित : दत्तात्रेय
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्पों की न्यूनतम संख्या : ७
पुष्य का नाम : कृष्णकमल
किस देवी-देवता को अर्पित : श्रीकृष्ण
अधिकाधिक तरंगें आकर्षित करने हेतु आवश्यक पुष्पों की न्यूनतम संख्या : ३
किस देवी-देवता पर किस तरह का पुष्प-पत्तियाँ व इत्र चढ़ाएँ
देवता, देवी, : श्रीराम
किस सुगंध की इत्र : जाई (एक प्रकार की चमेली)
देवता, देवी, : हनुमान्
किस सुगंध की इत्र : चमेली
देवता, देवी, : शिव
किस सुगंध की इत्र : केवड़ा
देवता, देवी, : श्रीदुर्गा देवी
किस सुगंध की इत्र : मोगरा
देवी देवता : श्रीलक्ष्मी
किस सुगंध की इत्र : गुलाब
देवी देवता : गणपति
किस सुगंध की इन : हिना
देवी देवता : दत्तात्रेय
किस सुगंध की इत्र : खस
देवी देवता : श्रीकृष्ण
किस सुगंध की इत्र : चंदन
पुष्प व इत्र के अतिरिक्त कुछ विशेष पत्तियों को भी देवपूजा में शामिल किया जाता है। जैसे विष्णु पर तुलसी के पत्ते, शिव पर बिल्वपत्र (बेल के पत्ते) और गणेश पर दूब अर्पित की जाती है। देवी-देवता को पाँच पत्ते चढ़ाने
चाहिए, जो ब्रह्मांड के पृथ्वी, जल, तप, वायु व आकाश पंचतत्त्वों के द्योतक हैं। पत्ते, पुष्प, फल आदि अपनी
प्राणवायु द्वारा ब्रह्मांड की सत्त्व तरंगों व देव तत्त्वों को ग्रहण करके पूजा करनेवाले जीव का कल्याण करते हैं। इस कारण इन्हें, जब ये ताजा व साफ-सुथरे हों, तभी अर्पित करना चाहिए, क्योंकि उस समय तक इनकी अपनी प्राणवायु देवशक्ति प्राप्त रखने की क्षमता रखती है। बासी फल-फूल कागज के फूलों की तरह होते हैं।
कमल का फूल व आँवला तीन दिन तक शुद्ध रहने की क्षमता रखते हैं, क्योंकि इन दोनों में प्राणवायु व धनंजयवायु तीन दिन तक रज-तम से लड़ने की क्षमता रखती हैं। इसी प्रकार तुलसी व बेलपत्र सूखने के बाद भी शुद्ध बने रहते हैं। ये वैज्ञानिक तथ्य हैं। तुलसी में ५० प्रतिशत विष्णुतत्त्व और बिल्वपत्र में ७० प्रतिशत शिवतत्त्व विद्यमान होता है।

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